मत बनो पलातक
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| मत बनो पलातक |
आजकाल चलता है
आगे भी चलता रहेगा
एक अनुचित और अपसंस्कृति
ओ है जो पलायती स बंचंती की
रीती और हलका सोच सभिमें है
हरकोईको कबलित करते जारहा
है
बहुत कम जो होते नेक इससे
परे है
बाकीसारे जीते डरकी मारे हारेकी
सहारे II
जहांदेखो एक ही स्वर की
गुंजन
चलोचलो भागोभागो जल्दी दूर
अपनी ही कर्तब और
जिम्मेदारी से
भले बनजाओ अपाहिज कर्मकुंठ II
वाहारे ! चालाक मानश की
अनुचिंता
आखिर अपनीही करतबसे कबतक
भागोगे
जानतेहो कामचोरकी हाथ हमेसा
रहता खाली
याद रखना जो अपना कर्मपर
करता न्याय
उसे हाथकी लकीर क्या कुदुरत
भी सात देता
उसे अचानक अतर्कित मिलती स्वर्णाभ
सफलता
अतः पलातक मत बनों आपनी ही कर्मसे
बन जाओ कर्मयोगी चुनलो
बास्तबता
इसमें है बल नईसी भाग्य
बनालेता II

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